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तंत्र साधना एवं आध्यात्म

तंत्र साधना हिन्दू आध्यात्मिक आचरणों की एक प्राचीन परम्परा हैए जो आध्यात्मिक शक्तियों का उपयोग करके व्यक्ति की चेतना का विस्तार करती है और दिव्य सत्ता के साथ ऐक्य के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति कराती है।

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तन्त्र, मन्त्र, यन्त्र

भारतीय सिंस्कृ र्त के अन्तः स्थल में प्रभार्वत होने वाली ज्ञानससलला के अपररमेय दो स्रोत हैं.
र्नगमए आगम अथवा तन्त्र। र्नगम की अध्यात्मर्वद्या को र्वज्ञान बनाने का श्रेय आगम को ही है।
र्नगम िारा प्रकासशत सत्य का सािात्कार करने का सािन आगम है। र्नगम ससद्धान्त पि है तो आगम उसका र्क्रयात्मकरूप। ष्व्यासोलिष्ट्िं जगत्सविम्श् का असभमत है.
श्रुर्तप्रमाणागममङ्लैश्च शेते जरामृत्युभयादभीतः ।
अथाित् श्रुर्त प्रमाणोिं का र्वचार और आगमशास्त्र में र्नर्दिष्ट् मङ्लमय सािनोिं के अनुष्ठान से
मनुष्य जरा.मृत्यु के भय से रर्हत होकर सुखपूविक सोता है।
सिंस्कृत सार्हत्य में आगम शब्द का प्रयोग र्वर्वि अथों में हुआ हैए र्कन्तु प्रतीयमान र्वरोिोिं
के बावजूद भी उनमें प्रायः एकरूपता है। वाचस्पर्त र्मश्र ने ष्तत्ववैशारदीष् में आगम की व्युत्पर्त्त इस प्रकार की है.
आगिलन्त बुर्द्धमारोहलन्त यस्माद् अभ्युदयर्नः श्रेयसोपाया स आगमः ।
आगम का मुख्य लक्ष्य श्र्क्रयाश् के ऊपर हैए तथार्प ज्ञान का भी र्ववरण यहााँ कम नहीिं है।
श्वाराहीतिंिश् के अनुसार आगम इन सात लिणोिं से समर्वत होता है रू सृर्ष्ट्ए प्रलयए देवताचिनए
सविसािनए पुरश्चरणए िट्कमिए ;शािंर्तए वशीकरणए स्तिंभनए र्विेिणए उिाटन तथा मारणद्ध सािन तथा ध्यानयोग। श्महार्नवािणश् तिंि के अनुसार कसलयुग में प्राणी मेध्य ;पर्विद्ध तथा अमेध्य ;अपर्विद्ध के
र्वचारोिं से बहुिा हीन होते हैं और इन्ीिं के कल्याणाथि महादेव ने आगमोिं का उपदेश पाविती को स्वयिं र्दया। इसीसलए कसलयुग में आगम की पूजापद्धर्त र्वशेि उपयोगी तथा लाभदायक मानी जाती है कलौ आगमसम्मतरू। तन्त्रागमीय सार्हत्य अत्यन्त समृद्ध एविं र्वशाल है। सिंख्या में र्कतने तासन्त्रक सम्प्रदाय आर्वभूित हुए और पश्चात् काल में र्कतने र्वलुप्त हुए यह कहना कर्ठन है। डॉण् बलदेव उपाध्याय ने तन्त्रोिं के तीन प्रमुख भेदोिं का प्रयोग र्कया है जो हैं.ब्राह्मणतन्त्रए बौितन्त्र तथा जैनतन्त्र। ब्राह्मण के उपास्यपप देवता के सभन्नता के कारण वैष्णवागमए शैवागम तथा शाक्तागम में र्वभासजत हैं। दाशिर्नक ससद्धान्तोिं के कारण भी आगम िैत प्रिानए अिैत एविं िैतािैत तीन प्रकार के हैं।
अप्पयदीसित ने ष्सशवाकिमसणदीर्पकाष् में शैवागम के दो भेद बताये हैं. वैर्दक तथा अवैर्दक।
वैर्दक तन्त्र वेदासिकाररयोिं के सलए तथा अवैर्दक तन्त्र अवैर्दकोिं के सलए स्वीकृत हैं। र्कन्तु दोनोिं ही प्रमासणक हैं। शर्क्तसिंगमतन्त्र में श् शाक्तिं शैविं गाणपत्यिं वैष्णविं सौरबौसिकम्श् तथा श् शाक्तिं शैविं वैष्णविं च सौरिं गाणपतमेव च। वौद्धिं च देवदेवेसश दशिनार्न च िट्क्रमात्श्। इत्यार्द वचन उपलब्ध होते हैं।

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